घनानंद के कवित्त / सवैया

Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1. 
कवि ने ‘चाहत चलन ये संदेसो लें सुजान को’ क्यों कहा है? 
उत्तर :
इस पंक्ति में नायक (कवि घनानंद) की विरह-विह्वलता का चित्रण है। कवि की प्रेमिका सुजान ने निरन्तर उनकी उपेक्षा की है। विरह की प्रबलता के कारण उनकी जीने की इच्छा ही समाप्त हो गई है। उनके प्राण अब शरीर से निकलना चाहते हैं। बस, अपनी प्रियतमा का संदेश सुनने की अभिलाषा में ही प्राण अभी तक अटके हुये हैं। 

प्रश्न 2. 
कवि मौन होकर प्रेमिका के कौन से प्रण पालन को देखना चाहता है? 
उत्तर :
कवि मौन होकर भी प्रेमिका से प्रेमव्रत का पालन करने की अपेक्षा करता है और यह देखना चाहता है कि वह अपने प्रेम प्रण का पालन करती है या नहीं। वह कवि की दशा देखकर कुछ बोलती है अथवा चुप ही बनी रहती है। 

प्रश्न 3. 
कवि ने किस प्रकार की पुकार से ‘कान खोलि है’ की बात कही है? 
उत्तर :
प्रेमिका सुजान घनानंद की करुण पुकार को अनसुना कर रही है पर उन्हें विश्वास है कि मेरी यह करुण पुकार कभी न कभी तो सुजान के कानों में पड़ेगी ही। सुजान कब तक कानों में रुई लगाए रहेगी, कभी न कभी तो घनानंद की करुण पुकार को सनेगी ही. यही कवि कहना चाहता है।

प्रश्न 4. 
प्रथम सवैये के आधार पर बताइए कि प्राण पहले कैसे पल रहे थे और अब क्यों दुखी हैं? 
उत्तर :
घनानंद ने प्रथम सवैये में यह बताया है कि पहले तो मेरे प्राण प्रेम के पोषण से पल रहे थे किन्तु अब प्रिय (सुजान) ने निष्ठुरता दिखाकर प्रेम का वह सहारा छीन लिया है। मेरे प्राण इसी कारण दुखी हैं और पुनः उसी प्रेम-पोषण को पाने के लिए विकल हो रहे हैं। 

प्रश्न 5. 
घनानंद की रचनाओं की भाषिक विशेषताओं को अपने शब्दों में लिखिए। 
उत्तर :
घनानंद ने अपनी रचनाएँ ब्रजभाषा में लिखी हैं। उनकी भाषा में लक्षणा और व्यंजना शब्द-शक्ति की प्रधानता है। भाषा में मुहावरों का प्रयोग भी वे करते हैं और उसमें अलंकार विधान भी है। उनकी जैसी साफ-सुथरी ब्रजभाषा बहुत कम कवियों की है। भाषा के लक्षक और व्यंजक बल का पूरा पता उन्हें था। वे ब्रजभाषा मर्मज्ञ थे। कहीं-कहीं शब्दों को तुकबन्दी के आग्रह से उन्होंने तोड़ा-मरोड़ा भी है और कुछ नवीन शब्दों का प्रयोग भी अपनी भाषा में किया है।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकारों की पहचान कीजिए – 
(क) कहि-कहि आवन छबीले मनभावन को, गहि-गहि राखति ही दै-दै सनमान को। 
(ख) कूक भरी मूकता बुलाय आप बोलि है। 
(ग) अब न घिरत घन आनंद निदान को। 
उत्तर :
(क) कहि-कहि, गहि-गहि, दै-दै में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है। 
(ख) कूकभरी मूकता में विरोधाभास है। 
(ग) घनआनँद में श्लेष अलंकार है -कवि का नाम, आनन्द प्रदान करने वाले बादल। 

प्रश्न 7. 
निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए – 
(क) बहुत दिनान को अवधि आसपास परे/खरे अरबरनि भरे हैं उठि जान को। 
(ख) मौन हू सौं देखिहाँ कितेक पन पालिहौ जू/कूकभरी मूकता बुलाय आप बोलिहै। 
(ग) तब तो छबि पीवत जीवत हे, अब सोचन लोचन जात जरे। 
(घ) सो घनआनंद जान अजान लौं ट्क कियौ पर वाँचि न देख्यौ। 
(ङ) तब हार पंहार से लागत हे, अब बीच में आन पहार परे। 
उत्तर :  
(क) प्रियतम ने आने की जो अवधि दी थी उसके पास आते ही मेरे ये प्राण विकल हो जाते हैं, इनमें खलबली मचने लगती है। 
(ख) मैं मौन रहकर देखेंगा कि आप प्रेम के कितने प्रणों का पालन करती हैं। मेरी मौन पुकार आपकी उदासीनता को नष्ट कर देगी और आप मेरे प्रेम को स्वीकार कर ही लेंगी। 
(ग) संयोगकाल के समय ये नेत्र सुजान के सौन्दर्यरूपी अमृत का पान करके जीवित रहते थे और अब वियोगकाल में शोकमग्न होकर जले जा रहे हैं। इन नेत्रों को अब प्रिय के दर्शन नहीं होते। 
(घ) मेरे इस हृदयरूपी प्रेमपत्र पर प्रिय की स्मतियों के चित्र ही लिखे (अंकित) थे पर दःख की बात है कि प्रिय ने अनजान की भाँति बिना पढ़े ही इस हृदयरूपी प्रेमपत्र को फाड़कर टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दिया। 
(ङ) संयोगकाल में प्रेयसी के गले में पड़ा हुआ हार भी पहाड़ जैसा (मिलन में बाधक) लगता था किन्तु अब तो वियोग में प्रिय इतनी दर चला गया है कि हम दोनों के बीच में कई पहाड (मिलन में बाधाएँ)

प्रश्न 8. 
सन्दर्भ सहित व्याख्या कीजिए – 
(क) झूठी बतियानि की पत्यानि तें उदास है, कै …… चाहत चलन ये संदेसो लै सुजान को। – 
(ख) जान घनआनंद यों मोहि तुम्है पैज परी …….. कबहूँ तो मेरियै पुकार कान खोलि है। 
(ग) तब तो छबि पीवत जीवत है…….बिललात महा दुख दोष भरे। 
(घ) ऐसों हियो हित पत्र पवित्र………टूक कियौ पर बाँचि न देख्यौ। 
उत्तर : 
(क) ये पंक्तियाँ धनानंद द्वारा रचित हैं कवि सुजान से यह कहना चाहता है कि आपकी झूठी बातों का अब इन प्राणों को विश्वास नहीं रहा है। ये निराश और उदास रहते हैं और अब इन्हें प्रसन्नता नहीं होती। ये प्राण आपके दर्शन को इतने व्याकुल हैं कि अधरों तक आ पहुँचे हैं और आपको अपना यह सन्देश सुनाना चाहते हैं कि यदि आपने शीघ्र ही इनकी करुण पुकार सुनकर अपने दर्शन न दिए तो ये प्राण अब शरीर में नहीं रहेंगे। अर्थात् ये आपके दर्शन की लालसा में ही शरीर में टिके हुए हैं अन्यथा कब के निकल गए होते। व्यंजना यह है कि यदि आप मुझे जीवित देखना चाहती हैं तो शीघ्र ही अपने दर्शन मुझे दें। 

(ख) घनानंद द्वारा रचित इस छन्द में कवि सुजान से कहता है कि अब मेरे और आपके बीच में इस बात पर बहस छिड़ गई है कि देखें कौन अपने प्रण से डिगता है, कौन हार मानता है। मैंने यह प्रण किया कि कभी-न-कभी तो अपनी करुण पुकार आपके कानों तक पहुँचाऊँगा ही, भले ही आप कानों में रुई दिए रहें और आपने शायद यह प्रण ठाना है कि मैं इसकी पुकार को कभी नहीं सुनूँगी। देखें कौन विजयी होता है, किसका प्रण पूरा होता है? 

(ग) इस पंक्ति में घनानंद ने तब (संयोगकाल) और अब (वियोगकाल) की तुलना प्रस्तुत की है। संयोगकाल में नायक के नेत्र प्रियतम के सौन्दर्यरूपी अमृत का निरन्तर पान करते थे, किन्तु अब वियोगकाल में प्रिय के दर्शन से वंचित होकर व्याकुल हैं और शोक से जल रहे हैं। कहाँ तो ये प्राण संयोगकाल में प्रेम के पोषण से पले और कहाँ अब वियोगकाल में उस प्रेम के लिए तरस रहे हैं।
 
(घ) घनानन्द अपनी प्रियतमा सुजान को उपालंभ देते हुए शिकायत कर रहे हैं कि मेरा हृदयरूपी प्रेमपत्र आपके ही सुन्दर चरित्रों (कथाओं) से अंकित था जिस पर किसी अन्य का नामोनिशान न था। ऐसा पवित्र था मेरा हृदयरूपी प्रेमपत्र पर अन्तरा (काव्य-खण्ड) आपने उसे बिना पढ़े ही टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दिया, उसे पढ़ने तक का कष्ट नहीं किया। अर्थात् आपने बिना सोचे-समझे मेरा हृदय तोड़कर अच्छा नहीं किया। कम से कम में हृदय को पढ़ तो लिया होता, यही शिकायत मुझे आपसे है।

योग्यता विस्तार – 

प्रश्न 1. 
निम्नलिखित कवियों के तीन-तीन कवित्त और सवैया एकत्रित कर याद कीजिए तुलसीदास, रसखान, पद्माकर, सेनापति। 
उत्तर : 
विद्यार्थी अपने अध्यापक से पूछकर इनके सवैये और कवित्त लिख लें और याद करें। प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं है।

प्रश्न 2. 
पठित अंश में से अनुप्रास अलंकार की पहचान कर एक सूची तैयार कीजिए। 
उत्तर : 
जहाँ एक वर्ण की पुनरावृत्ति (बार-बार आवृत्ति) होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है। इसके कई भेद भी होते हैं। यहाँ दिए अंश में अनुप्रास निम्न स्थानों पर है पयान-प्रान, चाहत-चलन, आनाकानी-आरसी, पैज-परी, टेक-टरें, जात-जरे, दुख-दोष, सुख-साज-समाज, पहर-परे।

Important Questions and Answers

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न –

प्रश्न 1. 
कवि घनानंद की प्रेमिका कौन थी? 
उत्तर :  
कवि घनानंद की प्रेमिका सुजान थी।

प्रश्न 2. 
कवि घनानंद के प्राण किसमें अटके हुए हैं? 
उत्तर :  
कवि घनानंद के प्राण प्रेमिका के दर्शन की लालसा में अटके हुए हैं। 

प्रश्न 3. 
संयोग काल में नायिका के गले का हार उसे कैसा लगता था? 
उत्तर :  
संयोग काल में नायिका के गले का हार उसे पहाड़ जैसा लगता था। 

प्रश्न 4. 
प्रिय सुजान की निष्ठुरता का वर्णन कवि ने किस कवित्त में किया है? 
उत्तर :  
प्रिय सुजान की निष्ठुरता का वर्णन कवि ने दूसरे सवैया में किया है। 

प्रश्न 5. 
कवि का हृदयरूपी प्रेम पत्र किसने बिना बाँचे ही टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दिया? 
उत्तर : 
कवि का हृदयरूपी प्रेम पत्र प्रिया सुजान ने बिना बाँचे ही टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दिया। 

प्रश्न 6. 
संकलित कविता में कवि घनानंद के कितने कवित्त और सवैये दिए हैं? 
उत्तर : 
इस कवित्त में कवि घनानंद के 2 कवित्त और 2 सवैये दिए हैं। 

प्रश्न 7.
प्रथम सवैये में कवि ने किसका वर्णन किया है? 
उत्तर : 
प्रथम सवैये में कवि ने संयोग और वियोग की स्थितियों का वर्णन किया है। 

प्रश्न 8. 
दोनों कवित्तों में किस अलंकार का प्रयोग किया गया है?
उत्तर : 
दोनों कवित्तों में अनुप्रास तथा श्लेष अलंकार का सुंदर प्रयोग है। 

प्रश्न 9. 
कवि प्रथम कवित्त किसको संबोधित करके लिखते हैं? 
उत्तर : 
प्रथम कवित्त मैं कवि ने अपनी प्रेमिका सुजान को संबोधित करके लिखा है। 

प्रश्न 10. 
कवि क्यों दुःखी हैं? 
उत्तर : 
उनकी प्रेमिका ने कहा था वह उनसे मिलने आयेगी लेकिन वह कोई कोई जवाब नहीं देती है और न ही अपने आने का कोई संदेश देती है।

प्रश्न 11. 
कवि घनानंद को ऐसा क्यों लगता है कि उनके प्राण निकलने वाले हैं? 
उत्तर : 
कवि धनानंद को अपने प्रेम का कोई इलाज नहीं दिखाई देता है इसलिए उनको ऐसा लगता है कि उनके प्राण निकलने वाले हैं। 

प्रश्न 12. 
दोनों कवित्त में विशेष क्या है? 
उत्तर : 
प्रथम कवित्त में करुण रस और दूसरे कवित्त में श्रृंगार रस है। दोनों में ही ब्रजभाषा का प्रयोग है।

प्रश्न 13. 
कवि मौन होकर क्या देखना चाहता है? 
उत्तर : 
कवि मौन होकर देखना चाहते हैं कि उनकी प्रेमिका कब तक के संदेश का जवाब नहीं देगी। कवि को विश्वास है कि उनका मौन ही उनके प्रेमिका की चुप्पी का जवाब है।

प्रश्न 14.
दूसरे सवैये में कवि ने किसका वर्णन किया है? 
उत्तर : 
दूसरे सवैये में कवि को यह दुःख है कि उसने अपने हृदय के सभी प्रेमभाव से लिखे पत्र, जो प्रेमिका को भेजे थे, वह उसने पढ़े नहीं और टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दिए।

लयूत्तरात्मक प्रश्न 

प्रश्न 1. 
घनानंद वियोग के कवि हैं संक्षेप में प्रकाश डालिए। 
उत्तर : 
घनानंद सुजान से प्रेम करते थे किन्तु सुजान ने उनसे बेवफाई की, परिणामतः उनका हृदय वियोग वेदना से ओतप्रोत हो गया। घनानन्द ने इस वेदना का चित्रण अपनी रचनाओं में किया है इसलिए उन्हें वियोग वेदना का कवि कहा जाता है। घनानन्द की कविता में प्रिय की निष्ठुरता का, अपनी विकलता का, दर्शन की लालसा का, प्रिय के सौन्दर्य आदि का मार्मिक चित्रण किया गया है।

प्रश्न 2. 
घनानंद निम्बार्क सम्प्रदाय में दीक्षित कृष्णभक्त हो गये थे। उनकी कविता में आया सुजान शब्द किसके लिए प्रयुक्त है? 
उत्तर : 
निम्बार्क सम्प्रदाय में दीक्षित होकर कृष्ण-भक्ति में रमने से पूर्व घनानंद सुजान नामक नर्तकी से प्रेम करते थे। घनानंद का प्रेम गम्भीर और सच्चा था किन्तु-सुजान बेवफा थी। इसी आघात के कारण वह वृन्दावन में रहकर कृष्णभक्त बने किन्तु उनकी काव्य-रचना में सुजान का नाम बार-बार आया है। माना जाता है कि सुजान श्रीकृष्ण के लिए प्रयुक्त प्रतीक है। कवि ने अपने लौकिक विरह को श्रीकृष्ण के अलौकिक वियोग में बदलकर अपने हृदयस्थ भावों को प्रकट किया है।

प्रश्न 3. 
भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए- ‘अधर लगे हैं आनि करि कै पयान प्रान, चाहत चलन ये संन्देसो लै सुजान को।’ 
उत्तर : 
प्रिय की निष्ठुरता, झूठी बातें और दर्शन की लालसा पूरी न होने से ये प्राण निराश हो गए हैं और अब शरीर त्यागना चाहते हैं। ये कंठ तक आ गये हैं और प्रिय दर्शन की लालसा लिए ये प्राण शरीर से बस प्रयाण करना ही चाहते हैं। कवि ने बड़ी कुशलता से अपने विरह विकल प्राणों की दर्शन लालसा का उल्लेख किया है। प्राण कंठगत होना मुहावरा है, प्राण केवल दर्शन की लालसा में टिके हैं अन्यथा कब के निकल गए होते।

प्रश्न 4. 
‘तब तौ छवि पीवत जीवत हे, अब सोचत लोचन जात जरे।’ उपर्युक्त पंक्ति में निहित भाव-सौन्दर्य लिखिए। 
उत्तर : 
भाव-सौन्दर्य घनानंद सुजान से गहरा प्रेम करते थे किन्तु सुजान के तिरस्कारपूर्ण व्यवहार ने उनके हृदय को वियोग-व्यथित कर दिया था। यहाँ ‘तब’ का प्रयोग संयोग अंवस्था तथा ‘अब’ का प्रयोग वियोग अवस्था के लिए हुआ है। कवि कहता है कि संयोगकाल में मेरे नेत्र तुम्हारे सौन्दर्य की छवि को निरन्तर देखकर जीते थे किन्तु अब वियोगकाल की अवस्था में ये नेत्र शोक के संताप के कारण जल रहे हैं। तुम्हारे उपेक्षापूर्ण व्यवहार से ये नेत्र अत्यन्त व्याकुल हैं। 

प्रश्न 5. 
तब तो छबि पीवत जीवत हे, अब सोचत लोचन जात जरे। 
हित-तोष के तोष स प्रान पले, बिललात महा दुख दोष भरे। 
पंक्तियों का आशय व्यक्त कीजिए। 
उत्तर : 
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि अपने मिलन के दिनों का वर्णन कर रहे हैं और अपनी प्रेमिका से कहते हैं कि मिलन । के दिनों में जब तुम मेरे साथ थीं, तो तुम्हारी छवि देखकर मैं जी लिया करता था। लेकिन अब बीते हुए दिन मुझे बहुत कष्ट दे रहे हैं और मेरी आँखों से आँसू बह रहे हैं। ऐसा लगता है कि मेरी यह आँखें अब जल रही हैं। 

प्रश्न 6. 
‘चाहत चलन ये सँदेसो लै सुजान को पंक्ति का आशय स्पष्ट करो। – 
उत्तर : 
प्रस्तुत पंक्ति में कवि अपनी प्रेमिका से मिलने की तड़प का वर्णन करते हैं। वह अपनी प्रेमिका से मिलने की विनती करते हैं। लेकिन उनकी प्रार्थना का उनकी प्रेमिका पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कवि को लगता है कि उनकी मृत्यु का समय आ गया है। वह कहता है कि बहुत समय हो गया है, आपका कोई संदेश नहीं मिलता है। अगर आपका कोई संदेश मिल जाए, तो उसके बाद मैं शांति से मर सकता हूँ। 

प्रश्न 7. 
कवि अपनी प्रेमिका की परीक्षा कैसे लेते हैं? 
उत्तर : 
कवि कहते हैं कि उनकी प्रेमिका उनके प्रति कठोर है। उनकी प्रेमिका का व्यवहार उनके प्रति बहुत कठोर हो गया है । मौन धारण करके देखेंगे कि कब तक प्रेमिका की कठोरता बनी रहती है। प्रेमिका इतनी कठोर हो गई है कि न तो कोई संदेश भेजती है और न ही मिलने आती है। कवि बार-बार प्रेमिका को बुलाते हैं लेकिन वह कवि की बात को अनसुना कर देती है। 

प्रश्न 8. 
धनांनद की रचनाओं की भाषाई विशेषताओं को अपने शब्दों में लिखिए। 
उत्तर : 
घनानंद की रचनाओं की भाषाई विशेषताएँ इस प्रकार हैं: 
(क) घनानंद ने अपनी रचनाओं में अलंकारों का बहुत सुंदर वर्णन किया है। 
(ख) घनानंद ब्रजभाषा के प्रवीण कवि थे। 
(ग) उनकी भाषा में सक्षमता देखी जाती है। 
(घ) वे काव्य भाषा मैं रचनात्मकता के जनक भी थे। 

प्रश्न 9. 
‘कान खोलि है’ से कवि का क्या अभिप्राय है? 
उत्तर : 
कवि ने अपनी प्रेमिका को कान खोलने की बात कही है। कवि कहता है कि वह कब तक अपने कानों में रुई डाले रखेगी। अर्थात प्रेमिका कब तक कवि को बातों और संदेश का जवाब नहीं देगी। एक दिन यह जरूर आएगा कि मेरे दिल की पुकार उसके कानों तक पहुँचेगी। अर्थात् कवि को विश्वास है कि उनकी प्रेमिका एक दिन उनके पास वापस जरूर आएगी। 

प्रश्न 10. 
आनाकानी आरसी निहारिबो करोगे कौलौं? 
कहा मो चकित दसा त्यों न दीठि डोलि है? 
पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर : 
कवि कहते हैं कि तुम कब तक मिलने में आनाकानी करती रहोगी और कब तक आरसी में निहारोगी अर्थात् कब तक अंगूठी के मोती में देखती रहोगी। तुम मुझे कब तक अनदेखा करती रहोगी ? शायद तुमको पता नहीं, तुम्हारे इस व्यवहार से मेरा क्या हाल हो गया है और तुम इस पर एक नजर भी नहीं डाल रही हो। 

निबन्धात्मक प्रश्न –

प्रश्न 1. 
घनानंद की ‘कवित्त’ कविता का सारांश लिखिए। 
उत्तर : 
कवित्त – यहाँ घनानन्द के दो कवित्त संकलित किए गए हैं। प्रथम कवित्त में कवि ने अपनी प्रेमिका सुजान के दर्शन की अभिलाषा एवं उत्कंठा व्यक्त की है। छन्द में विरहिणी नायिका नायक (श्रीकृष्ण) की झूठी बातों और अवधि बीतने पर भी न आने के कारण अत्यन्त व्याकुल दिखाई गई है। उसके प्राण कंठ तक आकर अटक गए हैं अर्थात् प्रिय के दर्शन की लालसा में प्राण शरीर में टिके हैं। प्रतीक रूप में कवि के प्राण अपनी प्रेयसी सुजान के दर्शन की अभिलाषा में अटके हैं। दूसरे कवित्त में कवि नायिका से कहता है कि तुम कब तक मिलने में आनाकानी करती रहोगी। हम दोनों के बीच एक होड़-सी लग गई है। आपने मेरी पुकार सुनकर अनसुनी करने की आदत बना ली है और मैंने यह दृढ़ निश्चय कर लिया है कि कभी तो मेरी पुकार आपके कानों में पड़ेगी।
 
प्रश्न 2.
घनानंद के ‘सवैया’ कविता का सारांश लिखिए। 
उत्तर : 
सवैया – घनानन्द द्वारा रचित दो सवैये यहाँ संकलित किए गए हैं। प्रथम सवैये में कवि ने संयोग और वियोग के समय की तुलना तब और अब के द्वारा की है.तब (संयोगकाल) में क्या स्थिति थी और अब (वियोग) में क्या हो गई है। संयोगकाल में नायक-नायिका को गले में पहने हुए हार भी पहाड़ की तरह बाधक लगते थे क्योंकि उन दोनों के मिलन में हार व्यवधान उत्पन्न करते थे किन्तु अब वियोग काल में प्रिय इतनी दूर चला गया है कि उन दोनों के बीच में अनेक पहाड़ आ गए हैं। दूसरे सवैये में कवि ने अपने हृदय को एक ऐसा प्रेमपत्र बताया है जिस पर प्रिय का चरित्र अंकित है किन्तु प्रिय ने निर्ममता का व्यवहार करते हुए उस हृदयरूपी प्रेमपत्र को बिना पढ़े ही फाड़कर (विदीर्ण करके) टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दिया है, इसी दुःख को यहाँ अभिव्यक्ति दी गई है। 

प्रश्न 3.
घनानंद की दी गई ‘कविता’ में जो मुहावरे उपलब्ध हैं उन्हें छाँटकर अर्थ सहित लिखिए। 
उत्तर : 

  1. प्राण कंठ तक आ जाना = प्राणों पर संकट आना (मृत्यु सन्निकट आ जाना)।
  2. आनाकानी करना = सुनकर भी अनसुनी करना (टालना)। 
  3. कानों में रुई दिए रहना = करुण पुकार को न सुनना। 
  4. कान खोलना = सुनना। 
  5. बीच में पहाड़ पड़ना = कार्य पूरा होने में बड़े व्यवधान आना। 
  6. टुकड़े-टुकड़े कर देना = फाड़ कर फेंक देना।

 
प्रश्न 4. 
‘तब हार पहार से लागत हे, अंब आनि के बीच पहार परे’ के शिल्प सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए। 
उत्तर : 

  1. इस पंक्ति में यमक अलंकार का प्रयोग है। हार-पहार में सभंगपद यमक अलंकार है। 
  2. हार-पहार से लागत हे में उपमा अलंकार है। 
  3. नायक-नायिका अपने मिलन में हार को भी पहाड़ जैसा बाधक मानते थे पर अब वियोग के क्षणों में नायक इतनी दूर है कि दोनों के बीच में पहाड़ों का अन्तराल आ गया है। अर्थात् मिलन में अनेक बाधाएँ हैं। आनि के बीच पहार परे में लाक्षणिकता है। 
  4. अब आनि, पहार परे में अनुप्रास अलंकार है। 
  5. ब्रजभाषा का प्रयोग है, साथ ही भाषा में लाक्षणिकता है। 
  6. सवैया छन्द का प्रयोग है। 

प्रश्न 5. 
रुई दिए रहोगे कहाँ लौ बहिरायबे की’ कबहूँ तो मेरियै पुकार कान खोलिहै’ का भावार्थ स्पष्ट करते हुए काव्य सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए। 
उत्तर : 
भाव-पक्ष-हे सुजान प्रिय आप कब तक अपने कानों में रुई देकर मेरी करुण पुकार को अनसुना करती रहेंगी। मेरी यह करुण पुकार निरन्तर जारी रहेगी क्योंकि मुझे पूरा विश्वास है कि कभी-न-कभी तो मेरी करुण पुकार सुनकर आप द्रवित होंगी और आपके कान खुल जाएँगे। 
कला-पक्ष-कानों में रुई लगाना -मुहावरा है। इसका अर्थ है किसी की बात को अनसुना करना। कवि ने भी यह पैज ठानी है कि वह अपनी करुण पुकार प्रिया तक अवश्य पहुँचायेगा। यहाँ वक्रोक्ति अलंकार का सौन्दर्य है। सरस साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है। भाषा में लाक्षणिकता है। कवित्त छन्द में कवि की काव्य-कुशलता दर्शनीय है। 

प्रश्न 6. 
‘सब ही सुख-साज-समाज टरे’ का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर : 
भाव-पक्ष-प्रिया के वियोग में कवि को कुछ भी अच्छा नहीं लगता। सुख-सुविधाएँ होने पर भी मन उनकी ओर जाता ही नहीं। प्रिय के अभाव में मन विकल एवं उदास है इसलिए सुख-सुविधाएँ, भोग-विलास कुछ भी अच्छा नहीं लगता, यही कवि.प्रतिपादित करना चाहता है। 

कला-पक्ष-इस पंक्ति में अनुप्रास अलंकार की छटा विद्यमान है क्योंकि ‘स’ वर्ण की अनेक बार आवृत्ति हुई है। इसमें ब्रजभाषा का प्रयोग है। वियोग श्रृंगार रस की व्यंजना हुई है। कवि ने सवैया छन्द का प्रयोग किया है। 

प्रश्न 7. 
‘सो घनआनँद जान अजान लौं टूक कियो पर बाँचि न देख्यौ’ के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए। 
उत्तर : 
भाव-पक्ष-घनानंद कवि सुजान को उपालम्भ देते हुए कहते हैं कि मैंने हृदयरूपी प्रेमपत्र आपको पढ़ने हेतु दिया था। आपने अनजान की भाँति उसे बिना पढ़े ही टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दिया। यह अच्छा नहीं किया। इस हृदयरूपी प्रेमपत्र पर केवल आपके ही सुन्दर चरित्र अंकित थे अर्थात् मैं तो केवल आपसे ही प्रेम करता था पर आपने मेरे इस प्रेम की कदर नहीं की और मेरा दिल तोड़कर अच्छा नहीं किया। यही शिकायत मुझे आपसे है। 

कला-पक्ष जान अजान लों में विरोधाभास और उपमा अलंकार है। जान शब्द सुजान और जानकार का बोधक होने से इसमें श्लेष अलंकार है। सरस, साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है। भाषा लाक्षणिकता से युक्त है। वियोग श्रृंगार रस का प्रभावशाली एवं सफल वर्णन हुआ है। 

साहित्यिक परिचय का प्रश्न –

प्रश्न :
घनानंद का साहित्यिक परिचय लिखिए। 
उत्तर : 
साहित्यिक परिचय – भाव-पक्ष-घनानंद मूलतः प्रेम-पीड़ा के कवि हैं। उन्होंने वियोग श्रृंगार का मनोहर वर्णन अपने काव्य में किया है। उनकी रचनाओं में प्रेम का गम्भीर, निर्मल, आवेगपूर्ण तथा व्याकुल कर देने वाला उदास रूप मिलता है। उनकी रचनाओं में भावों की जो गहराई है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।

कला-पक्ष-उनके काव्य में लाक्षणिकता, वाग्विदग्धता, वक्रोक्ति के साथ अलंकारों का प्रयोग कुशलता से हुआ है। उनकी काव्य-कला में सहजता के साथ ही वचन-वक्रता भी मिलती है। घनानंद ने परिष्कृत और साहित्यिक ब्रजभाषा में काव्य रचा है। उनकी भाषा व्यंजकता, कोमलता और मधुरता के गुणों से सम्पन्न है। वह सर्जनात्मक काव्य-भाषा के प्रणेता हैं। उन्होंने कवित्त, सवैया आदि छन्दों को अपनाया है। 
कृतियाँ – 1. सुजान सागर, 2. विरह लीला, 3. कृपाकंड निबन्ध, 4. रसकेलि वल्ली।

घनानंद के कवित्त / सवैया Summary in Hindi 

कवि परिचय :

जन्म सन् 1673 ई.। दिल्ली के बादशाह मुहम्मद शाह के मीर मुंशी रहे। दरबार की नर्तकी सुजान से प्रेम करते थे। बे-अदबी के कारण मुहम्मद शाह द्वारा राज्य से निष्कासित। ‘सुजान’ की बेवफाई से त्रस्त होकर वृन्दावन में निवास तथा निम्बार्क सम्प्रदाय में दीक्षित। कृष्ण-भक्ति। काव्य-रचना। सन् 1760 ई. में अहमद शाह अब्दाली के सैनिकों द्वारा हत्या। 

साहित्यिक परिचय – भाव-पक्ष घनानंद मूलतः प्रेम-पीड़ा के कवि हैं। उन्होंने वियोग श्रृंगार का मनोहर वर्णन अपने काव्य में किया है। उनकी रचनाओं में प्रेम का गम्भीर, निर्मल, आवेगपूर्ण तथा व्याकुल कर देने वाला उदात्त रूप मिलता है। घनानंद को साक्षात रसमूर्ति इसी कारण कहा जाता है। उनकी रचनाओं में भावों की जो गहराई है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने घनानंद की प्रशंसा में लिखा है-“प्रेम-मार्ग का ऐसा प्रवीण ब्रजभाषा का दूसरा कवि नहीं हुआ।” 

कला-पक्ष – रीतिकाल में कवियों की तीन श्रेणियाँ हैं। लक्षण ग्रन्थों के रचयिता कवि रीतिबद्ध तथा लक्षण-ग्रन्थ न लिखने वाले रीति-मुक्त कवि कहे जाते हैं। अपने हृदय की स्वतंत्र वृत्तियों पर काव्य-रचना करने वाले कवि रीतिसिद्ध कहलाते हैं। घनानंद रीतिसिद्ध कवि हैं। उनके काव्य में कला की बारीकी है। उनके काव्य में लाक्षणिकता, वाग्विदग्धता, वक्रोक्ति के साथ अलंकारों का प्रयोग कुशलता से हुआ है। उनकी काव्य-कला में सहजता के साथ ही वचन-वक्रता भी मिलती है। 

घनानंद ने परिष्कृत और साहित्यिक ब्रजभाषा में काव्य रचा है। उनकी भाषा व्यंजकता, कोमलता और मधुरता के गुणों से सम्पन्न है। वह सर्जनात्मक काव्य-भाषा के प्रणेता हैं। उन्होंने कवित्त, संवैया आदि छन्दों ने उनकी भाषा की प्रशंसा करते हुए लिखा है- “भाषा के लक्षक और व्यंजक बल की सीमा कहाँ तक है, इसकी पूरी परख इन्हीं को थी। भाषा पर जैसा अचूक अधिकार इनका था, वैसा और किसी कवि का नहीं।” 

कृतियाँ – 1. सुजान सागर, 2. विरह लीला, 3. कृपाकंड निबन्ध, 4. रसकेलि वल्ली। काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने उनकी 17 रचनाओं की सूची दी है जो विवादास्पद है।

सप्रसंग व्याख्याएँ

कवित्त 

1. बहुत दिनान को अवधि आसपास परे, 
खरे अरबरनि भरे हैं उठि जान को। 
कहि कहि आवन छबीले मनभावन को, 
गहि गहि राखति ही दै दै सनमान को।। 
झूठी बतियानि की पत्यानि तें उदास है कै, 
अब ना घिरत घन आनंद निदान को। 
अधर लगे हैं आनि करि कै पयान प्रान, 
चाहत चलन ये सँदेसो लै सुजान को।।

शब्दार्थ : 

अन्तरा (काव्य-खण्ड) 

सन्दर्भ : प्रस्तुत कवित्त घनानन्द द्वारा रचित है जिसे हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अन्तरा-भाग-2’ में ‘कवित्त’ शीर्षक से संकलित किया गया है। 

प्रसंग घनानन्द को अपनी प्रेयसी सुजान के दर्शन की अभिलाषा है। प्राण इसी आशा में शरीर में अटके हुए हैं कि इन्हें कभी-न-कभी तो प्रिय के दर्शन होंगे ही। प्राणों की इसी विकलता का वर्णन घनानन्द ने इस छन्द में किया है। 

व्याख्या : कविवर घनानंद अपनी प्रिय सुजान से कहते हैं कि हे प्रिये! मेरे ये प्राण आपके दर्शन की लालसा में ही अटके हुए हैं अन्यथा कब के शरीर छोड़कर निकल गए होते। आपके आने की अवधि बीत गई पर ये निरन्तर आपकी बाट जोहते रहते हैं। जैसे ही आपके आने की अवधि पास आती है मेरे ये प्राण आपके दर्शन की लालसा से छटपटाने लगते हैं और इनकी घबराहट अत्यधिक बढ़ जाती है। 

आपको क्या पता कि मैं किस प्रकार आपके आने की बात कह-कहकर इन्हें तसल्ली देता हूँ और तब ये प्राण शरीर में रुक पाते हैं अन्यथा कब के निकल गए होते। आपकी झूठी बातों का अब इन्हें विश्वास नहीं रहा है। उन झूठी बातों से ये निराश और उदास होने के कारण अब इन प्राणों को प्रसन्नता नहीं होती। अब तो ये प्राण बस प्रयाण करना चाहते हैं। ये अधरों तक आ पहुँचे हैं और आपको अपना यह सन्देश सुनाना चाहते हैं कि यदि आपने शीघ्र ही इनकी लालसा पूरी नहीं की अर्थात् अपने दर्शन नहीं दिए तो ये प्राण अब शरीर में टिकने वाले नहीं। ये आ की लालसा में ही शरीर में टिके हुए हैं, अन्यथा कब के निकल गए होते। 

विशेष :

  1. प्राणों की विरह विकलता एवं प्रियतम के दर्शन की लालसा की मार्मिक अभिव्यक्ति इन पंक्तियों में हुई है। 
  2. वियोग शृंगार रस है। 
  3. कहि-कहि और गहि-गहि में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है तथा अनुप्रास की छटा भी दर्शनीय है। 
  4. सरस और भावपूर्ण ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है। 
  5. कवित्त छन्द है। 

2. आनाकानी आरसी निहारिबो करोगे कौलौं?
कहा मो चकित दसा त्यों न दीठि डोलिहै? 
मौन हू सौं देखिहौं कितेक पन पालिहौ जू,
कूकभरी मूकता बुलाय आप बोलिहै। 
जान घनआनंद यों मोहिं तुम्हें पैज परी, 
जानियैगो टेक टरें कौन धौ मलोलिहै।।
रुई दिए रहोगे कहाँ लौ बहरायबे की?
कबहूँ तो मेरियै पुकार कान खोलिहै। 

शब्दार्थ : 

सन्दर्भ : प्रस्तुत पंक्तियाँ घनानंद द्वारा रचित हैं जिन्हें ‘कवित्त’ शीर्षक से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अन्तरा भाग-2’ में संकलित किया गया है। 

प्रसंग : नायक अपनी करुण प्रकार नायिका के कानों तक पहुँचाना चाहता है पर नायिका उसकी पुकार को सुनकर भी अनसुना कर देती है। वह कहता है कि कानों में रुई डालकर कब तक बहरी बनी रहोगी, कभी न कभी तो मेरी पुकार आपके कान अवश्य खोल देगी। 

व्याख्या : घनानंद कवि कहते हैं कि हे सुजान प्रिय, मेरी इस पुकार को अनसुना करके कब तक टालती रहोगी, कब तक अपनी आरसी (दर्पण) में अपनी छवि देखकर मेरी ओर से उदासीन बने रहने का प्रयत्न करोगी। मेरी दीन-हीन दयनीय चकित दशा को देखकर भी तुम कब तक अनदेखा करोगी और मेरे ऊपर अपनी दृष्टि भी न डालोगी। भले ही तुम कुछ न बोलो पर मौन रहकर भी मेरी ओर देखो तो सही। मेरी कूकभरी मौनवृत्ति पर तुम स्वयं ही बोलने लगोगी। अर्थात् भले ही मैं अपने बारे में आपसे कुछ न कहूँ पर आप मेरी इस विरह व्यथा को देखकर भी अनदेखा नहीं कर सकीं और अन्ततः आपको कुछ बोलना ही पड़ेगा। 

घनानंद कवि कहते हैं कि हे ! सुजान मेरे और आपके बीच में पैज पड़ गई है अर्थात् होड़ ठन गई है। अगर आपने न बोलने की जिद ठानी है तो मैंने भी यह जिद ठान ली है कि आपसे कुछ न कुछ बुलवाकर रहूँगा। देखें कौन विजयी होता है? वैसे मुझे पूरा विश्वास है कि आपको मेरी करुण पुकार सुनकर कुछ बोलना ही पड़ेगा। भले ही आप अपने कानों में रुई डालकर बैठी रहो पर मुझे यकीन है कि मेरी करुण पुकार कभी न कभी तो तुम्हारे कान खोल ही देगी। मेरी पुकार में यदि शक्ति है तो तुम उसकी अवहेलना नहीं कर पाओगी, ऐसा मुझे विश्वास है। 

विशेष : 

1. प्रिय की निष्ठुरता का उल्लेख इन पंक्तियों में है। आनाकानी, आरसी निहारिबो में प्रियतमा ‘सुजान’ की अन्यमनस्कता की ओर संकेत है। 
2. सरस, साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया गया है। 
3. कवित्त छन्द प्रयुक्त है। 
4. वियोग श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति है। 
5. ‘कूक भरी मूकता’ में विरोधाभास अलंकार है। वक्रोक्ति अलंकार का सौन्दर्य दर्शनीय है। 

सवैया 

1. तब तो छबि पीवत जीवत हे, अंब सोचत लोचन जात जरे। 
हित-तोष के तोष सु प्रान पले, बिललात महा दुख दोष भरे। 
घनआनँद मीत सुजान बिना, सब ही सुख-साज-समाज टरे। 
तब हार पहार से लागत है, अब आनि कै बीच पहार परे।। 

शब्दार्थ : 

सन्दर्भ : प्रस्तुत सवैया घनानंद द्वारा रचित है जिसे ‘सवैया’ शीर्षक से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा भाग-2’ में संकलित किया गया है।
 
प्रसंग : विरही व्यक्ति तंब (संयोगकाल) और अब (वियोगकाल) की तुलना कर रहा है। तब क्या स्थिति थी और अब क्या स्थिति हो गई है, इसका तुलनात्मक विवरण इस सवैये में प्रस्तुत किया गया है। 

व्याख्या : संयोगकाल में मेरे ये नेत्र प्रिया के सौन्दर्य दर्शन से तृप्त होकर ही जीवित रहते थे और अब वियोग काल में विरह दःख से व्यथित होकर जल रहे हैं। कहाँ तो मेरे इन प्राणों को आपके प्रेम का पोषण मिला और अब ये प्राण वियोग व्यथित होकर आपके प्रेम को पाने के लिए लालायित हैं और अनेक प्रकार के दुःख-दोष से युक्त हो रहे हैं। घनानंद कवि कहते हैं कि हे प्रिया सुजान, आपके बिना इस वियोग काल में मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता, मेरे सारे सुख समाप्त हो गए हैं, कुछ भी मुझे सुहाता नहीं। 

संयोग काल में तो हम दोनों को गले में पहने हार का भी व्यवधान खलता था। तुम्हारे (सुजानं) गले में पड़ा वह हार भी मुझे पहाड़ जैसा लगता था क्योंकि हमारे मिलन में वह बाधक बनता था। पर अब इस वियोग काल में तो हम दोनों एक-दूसरे से इतनी दूर हो गए हैं कि हमारे बीच में पहाड़ आ गए हैं। अर्थात् हमारे मिलने में अनेक बाधाएँ और अवरोध आ गये हैं। 

विशेष : 

  1. हार पहार से लागत हे में उपमा एवं अतिशयोक्ति के साथ-साथ सभंगपद यमक अलंकार है। 
  2. तब और अब की तुलना करते हुए संयोगकाल और वियोगकाल की तुलना की गई है। 
  3. ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है। भाषा में लाक्षणिकता है। 
  4. सवैया छन्द है। 
  5. वियोग श्रृंगार रस है।

2. पूरन प्रेम को मंत्र महा पन जा मधि सोधि सुधारि है लेख्यौ। 
ताही के चारु चरित्र बिचित्रनि यों पचिकै रचि राखि बिसेख्यौ। 
ऐसो हियो हितपत्र पवित्र जो आन-कथा न कहूँ अवरेख्यौ। 
सो घनआनंद जान अजान लौं टूक कियौ पर बाँचि न देख्यौ। 

शब्दार्थ :

सन्दर्भ : प्रस्तुत सवैया घनानन्द द्वारा रचित है जिसे हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अन्तरा भाग-2’ में ‘सवैया’ शीर्षक से संकलित किया गया है। 

प्रसंग : घनानन्द ने इस सवैया में अपने प्रिय सुजान को यह उपालंभ दिया है कि आपने मेरे हृदयरूपी प्रेमपत्र को बिना पढ़े ही टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दिया। ऐसा करके आपने उचित कार्य नहीं किया। 

व्याख्या : हे प्रिया सुजान! मैंने अपने हृदय को प्रेम के मंत्र की प्रतिज्ञा से युक्त कर रखा था और इसमें तुम्हारे उज्ज्वल क्रियाकलापों और चरित्र को अंकित कर तुम्हारी यादों के मधुर चित्रों से सुसज्जित कर रखा था। मेरा यह हृदयरूपी प्रेम पत्र ऐसा था कि इसमें सर्वत्र तुम (प्रिय सुजान) ही अंकित थी। किसी अन्य की कोई बात इसमें रंचमात्र भी न थी। घनानन्द कवि कहते हैं कि मुझे इस बात की वेदना है और शिकायत भी है कि मेरा हृदयरूपी प्रेमपत्र तुम्हारे ही चरित्र से.अंकित था पर तुमने अनजान की भाँति उसे बिना पढ़े ही फाड़कर और टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दिया। अर्थात् तुमने मेरे हृदय के प्रेम को जाने बिना ही उसे तोड़ दिया, इसी बात की मुझे आपसे शिकायत है। 

विशेष : 

  1. प्रिया सुजान की निष्ठुरता का वर्णन है। ‘ट्रक कियो’ का तात्पर्य हृदय विदीर्ण करने से है। 
  2. वियोग श्रृंगार रस है। 
  3. मधुर ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है। 
  4. सवैया छन्द में यह रचना प्रस्तुत है। 
  5. ‘जान अजान लौ में विरोधाभास और यमक अलंकार है।

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